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बुंदेलखंड की विरासत: देवरी में चंपा छठ का मेला पर विशेष!!

बुंदेलखंड की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत हमेशा से अपनी अनोखी परंपराओं और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध रही है। खजुराहो, ओरछा, और दतिया जैसे अद्भुत मंदिर न केवल देश बल्कि दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। हालांकि, बुंदेलखंड में कुछ ऐतिहासिक मंदिर ऐसे भी हैं, जिनकी महिमा कम लोग ही जानते हैं। इनमें से एक है देवरी, सागर में स्थित देव श्री खंडेराव मंदिर, जो अपने ऐतिहासिक महत्व और अद्भुत परंपराओं के कारण खास पहचान रखता है।


देव श्री खंडेराव मंदिर और चंपा छठ मेला

देवरी में स्थित देव श्री खंडेराव मंदिर का अगहन सुदी चंपा षष्ठी से लेकर पूर्णिमा तक 9 दिन चलने वाला मेला बुंदेलखंड में काफी प्रसिद्ध है। इस मेले का मुख्य आकर्षण है अग्निकुंड में दहकते अंगारों पर से भक्तों का निकलना। यह परंपरा करीब 400 साल पुरानी है और इस दौरान लोग अपने मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अग्निकुंड से बिना डरे निकलते हैं। इस साल भी इस मेले की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं, जिसमें 140 अग्निकुंड बनाए जा रहे हैं।


मंदिर का इतिहास और राजकीय योगदान

देवरी के इस मंदिर की स्थापना राजा रसाल जाजोरी ने 16वीं शताब्दी में की थी। कहा जाता है कि राजा के पुत्र की तबियत खराब हो गई थी, और तब देव श्री खंडेराव ने राजा को सपने में दर्शन दिए। सपने में भगवान ने राजा से कहा कि वह अग्निकुंड से नंगे पैर निकलकर अपनी मनोकामना पूरी करें। राजा ने ऐसा किया और उनके पुत्र की तबियत सुधर गई। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

देव श्री खंडेराव का स्वरूप और चमत्कारी शक्ति

देव श्री खंडेराव को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। मंदिर में भगवान खंडेराव घोड़े पर सवार हैं और माता पार्वती उनके अर्धांग रूप में विराजमान हैं। मंदिर के गर्भगृह में एक प्राचीन शिवलिंग है, जिसे स्वयं भू शिवलिंग कहा जाता है। चंपा षष्ठी के दिन जब सूर्य का प्रकाश शिवलिंग पर पड़ता है, तो वहां मौजूद भक्तगण पूजा-अर्चना के बाद दहकते अंगारों से निकलते हैं। इस दौरान भक्तगण भगवान श्री खंडेराव के जयकारे लगाते हैं और इस चमत्कारी घटना को देखते हुए आस्था से भरे होते हैं।

इस साल 140 अग्निकुंड का निर्माण

देवरी मंदिर में इस बार 140 अग्निकुंड खोदे जा रहे हैं। अब तक एक हजार से अधिक भक्त पंजीकरण करवा चुके हैं, और यह संख्या हर साल बढ़ रही है। मंदिर प्रबंधन ने विशेष साज सज्जा के साथ इन अग्निकुंडों की तैयारी शुरू कर दी है। 2 दिसंबर को गणपति पूजन और रुद्राभिषेक के बाद अग्निकुंड खोदने का कार्य शुरू हुआ। यह मेला 7 दिसंबर से 15 दिसंबर तक चलेगा।

महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

यह मेला केवल पुरुषों तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाएं भी इसमें बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं। मुख्य पुजारी नारायण राव वैद्य के अनुसार, अग्निकुंड में निकलने वाले भक्तों में महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा होती है, खासकर कुंवारी युवतियों और आदिवासी महिलाओं की भागीदारी अत्यधिक है।

निष्कर्ष

देवरी का देव श्री खंडेराव मंदिर और यहां होने वाला चंपा छठ मेला बुंदेलखंड की सांस्कृतिक धरोहर का अनमोल हिस्सा है। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह समाज में एकता, साहस, और आस्था को भी प्रगति करता है। इस तरह के मेलों के आयोजन से हमें अपनी धरोहर और परंपराओं को संरक्षित रखने की प्रेरणा मिलती है।

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