Skip to main content

अंतरराष्ट्रीय सोना तस्करी सिंडिकेट का भंडाफोड़, ₹40 करोड़ से अधिक का सोना जब्त!!

सुरक्षित पेयजल पर सवाल: इंदौर की घटना ने उजागर की शहरी जल प्रबंधन की कमजोर कड़ी!!

जन-स्वास्थ्य किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति का सबसे अहम पैमाना होता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छ पर्यावरण, सुरक्षित पेयजल और मजबूत बुनियादी ढांचा ये सभी किसी भी नागरिक के मूल अधिकारों में शामिल हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन बुनियादी जरूरतों को सुनिश्चित करने में भारत के कई शहरी और ग्रामीण क्षेत्र अब भी संघर्ष कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के इंदौर में हाल ही में सामने आई घटना इस कड़वी सच्चाई को एक बार फिर उजागर करती है।

नगरपालिका द्वारा आपूर्ति किए गए कथित तौर पर सुरक्षित पेयजल के सेवन से एक बच्चे सहित कम से कम चार लोगों की मौत और हजारों लोगों के बीमार पड़ने की खबर ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। सैकड़ों मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं, जिनमें कई की हालत गंभीर बनी हुई है। यह घटना इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि इंदौर को लगातार कई वर्षों से देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जा रहा है।

स्वच्छता रैंकिंग बनाम स्वास्थ्य सुरक्षा

इंदौर ने कचरा प्रबंधन, सफाई व्यवस्था और शहरी स्वच्छता के क्षेत्र में देशभर में मिसाल पेश की है। लेकिन साफ सड़कों और बेहतर कचरा निपटान के बावजूद, यदि पीने का पानी ही लोगों की जान के लिए खतरा बन जाए, तो स्वच्छता के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह स्पष्ट करता है कि स्वच्छता की परिभाषा केवल बाहरी साफ-सफाई तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि उसमें जल गुणवत्ता और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा भी शामिल होनी चाहिए।

जांच से पहले जवाबदेही जरूरी

घटना के बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच समिति गठित करने की घोषणा की गई है और शुरुआती तौर पर नई जल आपूर्ति लाइन के कार्य में देरी को इसकी वजह बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसे जानलेवा हालात बनने से पहले ही निगरानी तंत्र सक्रिय नहीं होना चाहिए था? अगर जल आपूर्ति की नियमित जांच और चेतावनी प्रणाली प्रभावी होती, तो इस संकट को समय रहते टाला जा सकता था। यह कोई पहली घटना नहीं है। बीते कुछ महीनों में मध्य प्रदेश में पानी से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आती रही हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि समस्या केवल किसी एक शहर या परियोजना तक सीमित नहीं, बल्कि जल प्रबंधन प्रणाली की व्यापक खामियों की ओर इशारा करती है।

नीतियों और वास्तविकता के बीच की खाई

सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन के तहत बुनियादी ढांचे में सुधार के दावे किए जाते हैं। आंकड़े भी बताते हैं कि अधिकांश परिवारों को ‘बेहतर जल स्रोत’ उपलब्ध हैं। लेकिन जब वही स्रोत दूषित साबित हो जाएं, तो इन आंकड़ों का महत्व सीमित रह जाता है। पानी की उपलब्धता तभी सार्थक है जब उसकी गुणवत्ता पूरी तरह सुरक्षित हो।

देश में वायु प्रदूषण पहले ही स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। ऐसे में असुरक्षित पेयजल एक और गंभीर चुनौती बनकर नहीं उभरना चाहिए। जल आपूर्ति प्रणालियों की नियमित वैज्ञानिक जांच, पुराने पाइपलाइन नेटवर्क का सुधार, रासायनिक और जैविक प्रदूषण की निगरानी तथा जिम्मेदार एजेंसियों की जवाबदेही तय करना अब टाला नहीं जा सकता।

इंदौर की घटना पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। यदि शहरी जल प्रबंधन में तत्काल सुधार नहीं किए गए, तो भविष्य में ऐसे हादसे और अधिक जानें ले सकते हैं। सुरक्षित पानी केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी शर्त है और इसे नजरअंदाज करने की कीमत समाज को भारी पड़ सकती है।

The News Grit, 02/01/2026

Comments

Popular posts from this blog

प्रोजेक्ट आरोहण: NHAI की नई योजना, लेकिन किसके लिए?

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ( NHAI) ने एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहल करते हुए टोल प्लाज़ा कर्मचारियों के बच्चों की शिक्षा और करियर निर्माण के लिए ‘प्रोजेक्ट आरोहण’ की शुरुआत की है। इस योजना का शुभारंभ एनएचएआई के अध्यक्ष श्री संतोष कुमार यादव ने नई दिल्ली स्थित मुख्यालय में किया। इस अवसर पर वर्टिस इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रस्ट के कार्यकारी निदेशक एवं संयुक्त सीईओ डॉ. जफर खान और एनएचएआई के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित रहे। शिक्षा तक समान पहुँच देने का प्रयास एनएचएआई ने वर्टिस इंफ्रास्ट्रक्चर ट्रस्ट के साथ मिलकर यह योजना शुरू की है , जिसका मकसद टोल प्लाज़ा कर्मचारियों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है। इस पहल का उद्देश्य वित्तीय बाधाओं को दूर करना , सामाजिक-आर्थिक भेदों को कम करना और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्रों , जिनमें निम्न-आय वाले परिवारों की लड़कियाँ , पहली पीढ़ी के शिक्षार्थी तथा अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति , अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र शामिल हैं , के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक समान पहुँच प्रदान करना है। एनएचएआई का मानना है कि शिक्षा ही वह साध...

बढ़ते एशिया को रोकने में कोरियाई उपमहाद्वीप की उथल पुथल के भरोसे अमरीकी थिंकटैंक!!

आधुनिक वित्तीय और आर्थिक प्रणाली औपनिवेशिक यूरोप और नवऔपनिवेशिक अमरीकी आधिपत्य की देन है। किंतु 21 वीं सदी आते-आते एशिया की नई उभरती अर्थव्यवस्थाओं चीन , भारत , जापान , कोरिया , वियतनाम , इंडोनेशिया आदि ने यह साबित कर दिया कि यह सदी एशिया की है। यही कारण है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एशिया में बढ़ते प्रभाव और असंतुलन को देखते हुए लगातार तनावपूर्ण बयानबाज़ी कर रहे हैं। दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग से उनकी हालिया मुलाक़ात इसी पृष्ठभूमि में बेहद महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है। शांति की पहल और ट्रम्प टॉवर का सपना व्हाइट हाउस में हुई मुलाक़ात के दौरान दोनों नेताओं ने उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन से संवाद स्थापित करने की इच्छा जताई। ली ने कहा कि यदि विभाजित कोरिया में शांति स्थापित हो जाती है तो यह ऐतिहासिक होगा। उन्होंने व्यंग्य और संकेत दोनों में जोड़ा कि “आप (ट्रम्प) उत्तर कोरिया में ट्रम्प टॉवर बना सकते हैं , जहाँ मैं आकर गोल्फ़ खेलूँगा।” ट्रम्प ने भी पुरानी मित्रता याद दिलाई और कहा कि वे किम जोंग उन से पहले ही तीन बार मिल चुके हैं और भविष्य में दोबारा मिलन...

भोपाल बनेगा देश का स्पोर्ट्स साइंस और हाई-परफॉर्मेंस ट्रेनिंग हब!!

खेल के क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ हासिल करने और खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रशिक्षण देने की दिशा में मध्यप्रदेश एक बड़ा कदम उठा रहा है। खेल विभाग द्वारा नाथु बरखेड़ा स्थित स्पोर्ट्स सिटी में लगभग 25 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक स्पोर्ट्स साइंस एवं हाई-परफॉर्मेंस सेंटर स्थापित किया जा रहा है। यह सेंटर उन सभी आधुनिक वैज्ञानिक और तकनीकी सुविधाओं से लैस होगा , जिनकी आज के समय में खिलाड़ियों के प्रदर्शन को निखारने और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करने में जरूरत होती है। इसमें खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता , मानसिक दृढ़ता , चोटों से बचाव , और कुल प्रदर्शन सुधार पर व्यापक रूप से काम किया जाएगा। क्यों जरूरी है स्पोर्ट्स साइंस सेंटर ? आज का खेल जगत बेहद तेज और चुनौतीपूर्ण हो गया है। सिर्फ प्रतिभा या अच्छी कोचिंग अब पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञ बताते हैं कि कई खिलाड़ी , चाहे वे कितने ही प्रतिभाशाली हों , मनोवैज्ञानिक दबाव , तकनीकी कमी या चोटों की वजह से अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते। अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में सफलता के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकन...