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बिजली चोरी के लंबित प्रकरणों के निपटारे का मौका, 14 मार्च को लगेगी लोक अदालत!!

बालाघाट की नसीबा खान ने करघे से बुनी स्वदेशी और स्वावलंबन की प्रेरक कहानी!!

मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के एक गांव मेहंदीवाड़ा (वारा सिवनी) से निकली एक अनूठी पहल आज परंपरा , स्वदेशी और महिला स्वावलंबन की प्रेरक मिसाल बन गई है। यहां की बुनकर नसीबा खान अपने करघे पर बुने एक विशेष स्टोल के माध्यम से न केवल पारंपरिक हथकरघा कला को जीवित रख रही हैं , बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सृजनशीलता की नई कहानी भी लिख रही हैं। यह पहल “हाउस ऑफ तसल्ली” स्टार्टअप - राफ्टएंडरसन प्रायवेट लिमिटेड के प्रयासों और “विमेन वीव” के सहयोग से संभव हुई है। इस सहयोग ने स्थानीय बुनकरों की कला को वैश्विक मंच तक पहुंचाने का रास्ता खोल दिया है। करघे से बुनी स्वदेशी की कहानी नसीबा खान द्वारा तैयार किया गया स्टोल साधारण वस्त्र नहीं है , बल्कि यह सादगी , स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की भावना का प्रतीक है। इसे हाथ से कांते गए ऑर्गेनिक कपास के धागों से करघे पर बुना गया है। इस स्टोल की सबसे खास विशेषता इसमें बुना गया चरखे का मोटिफ है , जो महात्मा गांधी के स्वदेशी और महिला स्वावलंबन के विचारों को समर्पित है। दो दिनों की मेहनत से तैयार हुआ अनोखा डिजाइन इस स्टोल को तैयार करने में लगभग दो दिन...

सागर की शान बनी इशिता शर्मा – अपने सपने को हकीकत में बदलने वाली बेटी!!!!

बेटियां अभिशाप नहीं , वरदान होती हैं। वे दो कुलों को आगे बढ़ाने वाली शक्ति होती हैं। अगर उन्हें सही दिशा , साथ और समर्थन मिले , तो वे हर वो सपना साकार कर सकती हैं , जिसे समाज कभी असंभव समझता था। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है मध्य प्रदेश के सागर की बहादुर बेटी इशिता शर्मा की , जिन्होंने अपने मजबूत इरादों और कठिन मेहनत के बल पर भारतीय नौसेना में सब लेफ्टिनेंट का गौरव हासिल किया है। जब सपना बना संकल्प और संकल्प बना उपलब्धि इशिता का बचपन सेना के अनुशासित माहौल में बीता। उनके पिता दीपक शर्मा , जो मिलेट्री इंजीनियरिंग सर्विस में अधिकारी हैं , ने परिवार में देशसेवा की भावना को पनपने दिया। इशिता ने इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकम्युनिकेशन में बीटेक करने के बाद टीसीएस जैसी प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनी में मुंबई में नौकरी की , लेकिन मन हमेशा वर्दी और देश सेवा के प्रति ही आकर्षित रहा। यही जज्बा उन्हें वापस एसएसबी की ओर खींच लाया। दादा-दादी की छांव में मिली शिक्षा की नींव इशिता के पिता की नौकरी की प्रकृति के कारण लगातार स्थानांतरण होते रहे , ऐसे में इशिता की स्कूली शिक्षा की ज़िम्मेदारी निभाई दादा आर....