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अंधविश्वास और तर्कशीलता पर हुआ गवेषणा संवाद, विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट महिलाओं का सम्मान

बालाघाट की नसीबा खान ने करघे से बुनी स्वदेशी और स्वावलंबन की प्रेरक कहानी!!

मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले के एक गांव मेहंदीवाड़ा (वारा सिवनी) से निकली एक अनूठी पहल आज परंपरा, स्वदेशी और महिला स्वावलंबन की प्रेरक मिसाल बन गई है। यहां की बुनकर नसीबा खान अपने करघे पर बुने एक विशेष स्टोल के माध्यम से न केवल पारंपरिक हथकरघा कला को जीवित रख रही हैं, बल्कि ग्रामीण महिलाओं की आत्मनिर्भरता और सृजनशीलता की नई कहानी भी लिख रही हैं। यह पहल “हाउस ऑफ तसल्ली” स्टार्टअप- राफ्टएंडरसन प्रायवेट लिमिटेड के प्रयासों और “विमेन वीव” के सहयोग से संभव हुई है। इस सहयोग ने स्थानीय बुनकरों की कला को वैश्विक मंच तक पहुंचाने का रास्ता खोल दिया है।

करघे से बुनी स्वदेशी की कहानी

नसीबा खान द्वारा तैयार किया गया स्टोल साधारण वस्त्र नहीं है, बल्कि यह सादगी, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की भावना का प्रतीक है। इसे हाथ से कांते गए ऑर्गेनिक कपास के धागों से करघे पर बुना गया है। इस स्टोल की सबसे खास विशेषता इसमें बुना गया चरखे का मोटिफ है, जो महात्मा गांधी के स्वदेशी और महिला स्वावलंबन के विचारों को समर्पित है।

दो दिनों की मेहनत से तैयार हुआ अनोखा डिजाइन

इस स्टोल को तैयार करने में लगभग दो दिनों का अथक श्रम लगा। करघे की लय और बुनकर के कौशल से तैयार हुआ यह डिजाइन ग्रामीण भारत की रचनात्मकता और धैर्य का अद्भुत उदाहरण है। हाथ से बुना यह वस्त्र स्पर्श में बेहद कोमल है और इसकी सादगी में एक कालातीत आकर्षण झलकता है। यह स्टोल दर्शाता है कि ग्रामीण भारत की सृजनशील शक्ति कैसे परंपरा और आधुनिकता को एक साथ बुन सकती है।

ग्रामीण महिलाओं के लिए आजीविका का माध्यम

इस पहल का उद्देश्य केवल एक सुंदर वस्त्र तैयार करना नहीं है, बल्कि पारंपरिक हथकरघा कला को जीवित रखना और ग्रामीण महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका से जोड़ना भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में हथकरघा बुनाई लंबे समय से आजीविका का साधन रही है, लेकिन बदलते समय के साथ कई जगह यह परंपरा कमजोर पड़ने लगी थी। “हाउस ऑफ तसल्ली” और “विमेन वीव” के सहयोग से शुरू हुई यह पहल स्थानीय बुनकरों को नई पहचान और अवसर प्रदान कर रही है।

वैश्विक मंच तक पहुंचा बालाघाट का हुनर

इस सृजन की खास बात यह भी है कि यह केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहा। इस विशेष स्टोल को अनुराधा शंकर (सेवानिवृत्त आईपीएस), जो गांधी पीस फाउंडेशन से संबद्ध हैं, ने 26 अक्टूबर 2025 को रोम में आयोजित एक कार्यक्रम में वेटिकन सिटी के धर्मगुरू पोप सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों को भेंट किया।

यह क्षण न केवल नसीबा खान के लिए, बल्कि पूरे बालाघाट और मध्यप्रदेश के लिए भी गर्व का विषय बना। ग्रामीण भारत के एक गांव में तैयार यह सृजन अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा और भारतीय हथकरघा परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाने में सहायक बना।

कल्पना से साकार तक की यात्रा

इस अनूठी कल्पना को साकार करने में नर्मदापुरम की महिला उद्यमी रत्नम श्री और राकेश ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके सहयोग से यह विचार एक ठोस रूप ले सका और स्थानीय बुनकरों की कला को नई दिशा मिली।

परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम

आज जब दुनिया तेजी से आधुनिक तकनीक की ओर बढ़ रही है, ऐसे समय में बालाघाट की यह पहल यह संदेश देती है कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। नसीबा खान के करघे से बुना यह स्टोल केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की सृजनशीलता, स्वदेशी भावना और महिला सशक्तिकरण की जीवंत कहानी है। यह उस शक्ति का प्रतीक है जो छोटे-छोटे गांवों से निकलकर दुनिया को प्रेरित कर सकती है। बालाघाट की इस प्रेरक कहानी ने यह साबित कर दिया है कि यदि अवसर और सहयोग मिले, तो ग्रामीण प्रतिभा पूरे देश का नाम रोशन कर सकती है।

The News Grit, 09/03/2026

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