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नेशनल लोक अदालत : सागर में एक ही दिन में 3,976 प्रकरणों का निपटारा, 16.92 करोड़ रुपये के अवार्ड पारित!!

राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, नई दिल्ली और मध्य प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, जबलपुर के दिशा-निर्देशानुसार 13 सितम्बर 2025 (शनिवार) को जिलेभर में नेशनल लोक अदालत का आयोजन हुआ। इस लोक अदालत में 50 खंडपीठों द्वारा कुल 3,976 मामलों का निपटारा किया गया, जिसमें ₹16,92,01,148 के अवार्ड पारित किए गए।

लोक अदालत : त्वरित और सुलभ न्याय का माध्यम

लोक अदालत भारतीय न्याय व्यवस्था का एक विशेष मंच है, जहाँ विवादों का निपटारा सहज, सुलभ और आपसी सहमति के आधार पर किया जाता है। यह छोटे और मध्यम स्तर के मामलों के लिए एक वैकल्पिक न्याय प्रणाली प्रदान करता है, जिसमें न्यायाधीश, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता पक्षकारों की सहायता करते हैं। पूरी प्रक्रिया अनौपचारिक होती है और इसका उद्देश्य जटिल कानूनी औपचारिकताओं से बचते हुए शीघ्र समाधान निकालना है।

मोटर दुर्घटना, चेक बाउंस, उपभोक्ता विवाद, पारिवारिक और दीवानी मामले जैसी कई श्रेणियों के प्रकरण लोक अदालत में सुलझाए जाते हैं। इसमें दोनों पक्ष आपसी बातचीत और मध्यस्थता के जरिए समझौते तक पहुँचते हैं। नई तकनीकों जैसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का भी उपयोग किया जाता है, ताकि दूरस्थ पक्षकार भी आसानी से जुड़ सकें।

लोक अदालत की शुरुआत 1982 में गुजरात से हुई थी और बाद में 1987 के विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम के तहत इसे कानूनी मान्यता दी गई। इसका मूल उद्देश्य त्वरित न्याय सुनिश्चित करना, अदालती लंबित मामलों का बोझ कम करना और समाज में शांतिपूर्ण समाधान की संस्कृति को प्रोत्साहित करना है।

कितने और किस प्रकार के मामले सुलझे

13 सितम्बर 2025 को सागर में सम्‍पन्‍न हुई लोक अदालत में कुल 1,773 लंबित प्रकरण और 2,203 प्री-लिटिगेशन प्रकरण का निपटारा किया गया। निपटाए गए मामलों में विभिन्न श्रेणियों के प्रकरण शामिल थे। इसमें मोटर दुर्घटना के 155 प्रकरणों में कुल ₹3,55,27,231 का मुआवजा, चेक बाउंस के 302 प्रकरणों में ₹6,67,97,480 की समझौता राशि और आपराधिक शमन योग्य 724 प्रकरण शामिल थे। इसके अलावा, विद्युत विवाद के 199 प्रकरण, पारिवारिक विवाद के 138 प्रकरण, दीवानी एवं अन्य 247 प्रकरण तथा बैंक रिकवरी के 3 प्रकरण का समाधान भी किया गया। प्री-लिटिगेशन प्रकरणों में 237 बैंक संबंधी, 274 विद्युत विभाग से जुड़े, 1,056 नगर निगम के और 600 अन्य प्रकरणों का निराकरण हुआ, जिनसे कुल ₹3,46,70,121 का राजस्व प्राप्त किया गया। इस प्रकार, लोक अदालत ने एक ही दिन में अनेक मामलों का सफल और संतोषजनक समाधान सुनिश्चित किया।

नेशनल लोक अदालत में कई उल्लेखनीय मामले सुलझाए गए

·         माया प्रजापति बनाम रामाधार तिवारी मामला : बिना बीमा वाले वाहन से दुर्घटना में मृतक के परिजनों को ₹16,00,000 और अन्य आहत को ₹50,000 का प्रतिकर मिला। प्रतिवादी जेल में होने के बावजूद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से समझौता संपन्न हुआ।

·         जानकी पटेल बनाम प्रेमसिंह राजपूत मामला : 21 लाख रुपये की वसूली का लंबित प्रकरण ₹11,00,000 प्रतिकर पर निपटा।

·         कमलेश घोषी बनाम रूद्रप्रताप सिंह मामला : बिना बीमा वाहन दुर्घटना में ₹1,40,000 का प्रतिकर आपसी राजीनामे से तय हुआ।

·         पारिवारिक विवाद का समाधान : कुटुम्ब न्यायालय में चल रहे विवाद में पति-पत्नी को समझाकर अलगाव की स्थिति से निकालकर साथ रहने के लिए सहमत कराया गया।

जिला मुख्यालय सागर में आयोजित इस नेशनल लोक अदालत का शुभारंभ माननीय प्रधान जिला न्यायाधीश एवं अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, श्री महेश कुमार शर्मा ने माँ सरस्वती की प्रतिमा पर दीप प्रज्ज्वलन और माल्यार्पण कर किया। इस अवसर पर प्रधान न्यायाधीश, कुटुम्ब न्यायालय श्री अखिलेश कुमार मिश्र, विशेष न्यायाधीश व को-ऑर्डिनेटर श्री प्रदीप सोनी, सचिव श्री अंकित श्रीवास्तव, अधिवक्ता परिषद की सह-अध्यक्ष श्रीमती रश्मि ऋतु जैन, अधिवक्तागण, न्यायिक अधिकारी और बैंक, बीमा, बीएसएनएल एवं विद्युत विभाग के अधिकारी उपस्थित रहे।

अपने उद्बोधन में प्रधान जिला न्यायाधीश श्री शर्मा ने कहा कि लोक अदालतें समय और धन की बचत के साथ विवाद समाधान का सबसे सरल माध्यम हैं, इसलिए अधिक से अधिक लोगों को इसका लाभ उठाना चाहिए।

लोक अदालतों में वर्षों तक लंबित रहने वाले मामलों को यहाँ आपसी सहमति और संवाद के माध्यम से हल किया जाता है। यह व्यवस्था केवल विवाद निपटान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पक्षों के बीच सामंजस्य और सुलह की संस्कृति को भी बढ़ावा देती है। लोकतांत्रिक भावना यही है कि न्याय केवल दंडात्मक न होकर मानवीय और समाधानकारी भी हो। इससे पूर्व भारतीय समाज की परंपरा में खाप पंचायतों ने भी विवाद निपटाने की भूमिका निभाई है। उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी पकड़ गहरी रही है और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता भी इनके पक्ष में मानी जाती है। किंतु खाप पंचायतों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनके निर्णय अक्सर पितृसत्तात्मक मूल्यों और सामंती सोच से प्रभावित होते हैं। इनमें स्त्रियों, दलितों और कमजोर वर्गों की अनदेखी होती है तथा विवाह, जाति और सामाजिक आचार-व्यवहार पर ऐसे फरमान जारी किए जाते हैं, जो संविधान और कानून की मूल भावना के विपरीत होते हैं। कई बार तो इन पंचायतों द्वारा लिए गए फैसले मानवीय गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भी हनन करते हैं, जैसे ऑनर किलिंग या जातिगत बहिष्कार जैसी अमानवीय घटनाएँ।

लोक अदालतों और खाप पंचायतों की कार्यप्रणाली व फैसलों से स्पष्ट हुआ है कि लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण व्यवस्था के रूप में लोक अदालतें अधिक प्रासंगिक और उपयोगी हैं। इस दृष्टि से लोक अदालतें न केवल त्वरित न्याय का माध्यम हैं, बल्कि लोकतंत्र के सशक्त स्तंभ के रूप में भी खड़ी होती हैं।

The News Grit, 15/09/2025

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