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पोंडुरु खादी को GI टैग, पारंपरिक कारीगरों को संरक्षण और वैश्विक पहचान की नई राह!!

आंध्र प्रदेश की सुप्रसिद्ध पोंडुरु खादी को भौगोलिक संकेतक (GI टैग) का दर्जा प्रदान किया गया है। यह पंजीकरण भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री द्वारा भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के अंतर्गत खादी और ग्रामोद्योग आयोग के पक्ष में किया गया है। GI टैग मिलने से इस दुर्लभ हस्तनिर्मित खादी उत्पाद को कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा और इसकी विशिष्ट पहचान व प्रामाणिकता सुरक्षित रह सकेगी।

शुक्रवार को मीडिया के लिए जारी एक बयान में केवीआईसी के अध्यक्ष मनोज कुमार ने पोंडुरु खादी को GI टैग प्रदान किए जाने पर गहरा संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि केवीआईसी देश के पारंपरिक खादी उत्पादों को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए निरंतर प्रयासरत है और यह उपलब्धि उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

खादी क्षेत्र के लिए गर्व का क्षण

केवीआईसी अध्यक्ष मनोज कुमार ने कहा कि पोंडुरु खादी को GI टैग मिलना पूरे खादी क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है। यह न केवल इस विशिष्ट हस्तकारी वस्त्र की प्रामाणिकता की रक्षा करता है, बल्कि उन कारीगरों के योगदान को भी सम्मान देता है, जो पीढ़ियों से इस पारंपरिक कला को जीवित रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों ने देशभर के पारंपरिक कारीगरों में नई ऊर्जा, सम्मान और पहचान का संचार किया है।

क्या है पोंडुरु खादी की खासियत

पोंडुरु खादी आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के पोंडुरु गाँव में तैयार की जाने वाली एक पारंपरिक हस्तनिर्मित सूती खादी है, जिसे स्थानीय रूप से ‘पटनुलु’ कहा जाता है। यह खादी विशेष रूप से पहाड़ी कपास, पुनासा कपास और लाल कपास से बनाई जाती है, जो इसी क्षेत्र में उगाई जाती हैं।

इस खादी की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कपास की सफाई, कताई और बुनाई की पूरी प्रक्रिया हाथों से की जाती है, जिससे सदियों पुराना पारंपरिक कौशल आज भी सुरक्षित है। इसके अलावा, पोंडुरु खादी की एक अनोखी पहचान यह भी है कि कपास की सफाई के लिए वालुगा मछली के जबड़े की हड्डी का उपयोग किया जाता है। यह तकनीक विश्व में केवल इसी क्षेत्र में देखने को मिलती है।

अत्यंत बारीक गुणवत्ता की पहचान

केवीआईसी अध्यक्ष ने बताया कि पोंडुरु खादी अपनी अत्यधिक उच्च धागा संख्या (यार्न काउंट) - लगभग 100 से 120 के लिए जानी जाती है। यह इसकी बेहद बारीक, टिकाऊ और उच्च गुणवत्ता को दर्शाता है, जो इसे अन्य खादी उत्पादों से अलग बनाती है।

कारीगरों को मिलेगा सीधा लाभ

मनोज कुमार ने कहा कि GI टैग मिलने से पोंडुरु खादी को न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई पहचान मिलेगी। इससे वैश्विक बाजार तक इसकी पहुंच आसान होगी, कारीगरों की आय में वृद्धि होगी और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि पोंडुरु खादी महात्मा गांधी के स्वदेशी विचारों से गहराई से जुड़ी हुई है। आज खादी एक फैशन स्टेटमेंट के साथ-साथ आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बन चुकी है, जो गांधीजी की वैचारिक निरंतरता को सशक्त रूप से दर्शाती है।

नकली उत्पादों से मिलेगा संरक्षण

उन्होंने कहा कि जीआई टैग प्राप्त होने के बाद पोंडुरु खादी को नकली उत्पादों से कानूनी संरक्षण मिलेगा, जिससे उपभोक्ताओं को शुद्ध एवं प्रामाणिक उत्पाद की गारंटी मिलेगी और कारीगरों को उनके श्रम का उचित मूल्य सुनिश्चित होगा। उन्होंने यह भी कहा कि केवीआईसी भारत के पारंपरिक खादी उत्पादों को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए निरंतर प्रयासरत है तथा जीआई टैग से पोंडुरु खादी की अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ेगी और वैश्विक बाजार तक इसकी पहुंच आसान होगी।

The News Grit, 17/01/2026

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